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भारत देश के ओडिशा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में भगवान जगन्नाथ का विशाल मंदिर है। जगन्नाथ मंदिर को हिन्दू धर्म में चार धाम से से एक माना गया है। यहाँ हर वर्ष भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है जो भारत ही नहीं बल्कि विश्व प्रसिद्ध हैं। जगन्नाथपुरी को मुख्यतः पुरी के नाम से जाना जाता हैं। इस वर्ष भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा 23 जून को निकलेगी। 

पुरी का जगन्नाथ मंदिर भक्तों की आस्था केंद्र है, जहां वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो अपनी बेहतरीन नक्काशी व भव्यता लिए प्रसिद्ध है। यहां रथोत्सव के वक्त इसकी छटा निराली होती है, जहां प्रभु जगन्नाथ को अपनी जन्मभूमि, बहन सुभद्रा को मायके का मोह यहां खींच लाता है। रथयात्रा के दौरान भक्तों को सीधे प्रतिमाओं तक पहुंचने का मौका भी मिलता है।

यह दस दिवसीय महोत्सव होता है। इस दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से होता है और कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी महीने भर किए जाते हैं। श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना गया है।

बसंत पंचमी से ही शुरु हो जाती है तैयारियां 

रथ के निर्माण में कील या किसी धातु का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। नीम की लकड़ी का चयन बसंत पंचमी से शुरू होती है और अक्षय तृतीया से रथ निर्माण शुरू होता है।

रथ यात्रा के लिए बनते हैं तीन विशेष रथ

भगवान श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की इस रथ यात्रा के लिए तीन विशेष रथ बनाए जाते हैं, जिस पर सबसे पहले बलराम, दूसरे पर सुभद्रा और तीसरे पर भगवान जगन्नाथ सवार होते हैं। जिसे 'गरुड़ध्वज' या 'कपिलध्वज', 'तलध्वज' और 'पद्मध्वज' कहते हैं। 

जगन्नाथजी का रथ 'गरुड़ध्वज' या 'कपिलध्वज' कहलाता है। 16 पहियों वाला यह रथ 13.5 मीटर ऊंचा होता है जिसमें लाल व पीले रंग के कप़ड़े का इस्तेमाल होता है। विष्णु का वाहक गरुड़ इसकी हिफाजत करता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी' कहते हैं।

बलराम का रथ 'तलध्वज' के बतौर पहचाना जाता है, जो 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है। यह लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं। त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इसके अश्व हैं। जिस रस्से से रथ खींचा जाता है, वह बासुकी कहलाता है।

'पद्मध्वज' यानी सुभद्रा का रथ। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है। रथ की रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। रथध्वज नदंबिक कहलाता है। रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुडा कहते हैं।

जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास 

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा देश में एक पर्व की तरह मनाई जाती हैं इसलिए पूरी के अलावा कई जगह यह यात्रा निकाली जाती है। रथयात्रा को लेकर कई तरह की मान्यताएं एवं इतिहास हैं। बताया जाता है कि, एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर देखने की चाह रखते हुए भगवान से द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन को रथ में बैठाकर नगर का भ्रमण करवाया। 

जिसके बाद से यहाँ हर वर्ष जगन्नाथ रथयात्रा निकाली जाती हैं। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम एवं बहन सुभद्रा की प्रतिमायें रखी जाती हैं और उन्हें नगर का भ्रमण करवाया जाता हैं। यात्रा के तीनों रथ लकड़ी के बने होते हैं जिन्हें श्रद्धालु खींचकर चलते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए लगे होते हैं एवं भाई बलराम के रथ में 14 व बहन सुभद्रा के रथ में 12 पहिए लगे होते हैं। यात्रा का वर्णन स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, बह्म पुराण आदि में मिलता हैं। इसीलिए यह यात्रा हिन्दू धर्म में काफी खास हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा के मुख्य आकर्षण 

  1. रथ यात्रा के दिन तीनों मूर्तियों को श्रीमंदिर से बाहर लाने वाली प्रक्रिया होती है जिसे पहंडी बिजे कहते हैं। 
  2. इसके बाद विधि विधान से भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम एवं बहन सुभद्रा की प्रतिमायें रथों पर सवार होते हैं। फिर, भक्त इन रथों को मोटे-मोटे रस्सों से खींचते हैं और उन्हें नगर का भ्रमण करवाते हैं। 
  3. रथयात्रा के दौरान लाखों की संख्या में लोग शामिल होते हैं एवं रथ को खींचने के लिए श्रद्धालुओं का भारी तांता लगता हैं। 
  4. यह रथ यात्रा श्री जगन्नाथ मंदिर से प्रारंभ होकर गुंडीचा मंदिर तक जाती है, इसलिए इसे गुंडिचा महोत्सव भी कहा जाता है।

जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व

हिन्दू धर्म में जगन्नाथ रथ यात्रा का एक बहुत बड़ा महत्व हैं। मान्यताओं के अनुसार, रथ यात्रा को निकालकर भगवान जगन्नाथ को प्रसिद्ध गुंडिचा माता मंदिर पहुँचाया जाता हैं। यहाँ भगवान जगन्नाथ आराम करते हैं। गुंडिचा माता मंदिर में भारी तैयारी की जाती हैं एवं मंदिर की सफाई के लिये इंद्रद्युमन सरोवर से जल लाया जाता हैं। 

यात्रा का सबसे बड़ा महत्व यही है कि, यह पूरे भारत में एक पर्व की तरह मनाया जाता हैं। चार धाम में से एक धाम जगन्नाथ मंदिर को माना गया है। इसलिए जीवन में एक बार इस यात्रा में शामिल होने का शास्त्रों में भी उल्लेख हैं। जगन्नाथ रथयात्रा में सबसे आगे भगवान बालभद्र का रथ रहता हैं बिच में भगवान की बहन सुभद्रा का एवं अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ रहता हैं। इस यात्रा में जो भी सच्चे भाव से शामिल होता हैं उसकी मनोकामना पूर्ण होकर उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कैसे पहुंचे?

हवाई मार्ग - पुरी जाने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा भुबनेश्वर है जो कि पुरी शहर से तक़रीबन 60 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। एयरपोर्ट से पुरी पहुंचने के लिए आपको आसानी से कैब या बस की सुविधा मिल जायेगी। 

सड़क मार्ग - सड़क के माध्यम से भी पुरी की ओवरऑल कनेक्टिविटी अच्छी है। इसलिए, आप पुरी की यात्रा के लिए या तो टैक्सी या फिर बस ले सकते हैं।  और, आपको किसी भी प्रकार के अवरोधों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

रेल मार्ग - पुरी तक रेल नेटवर्क और संपर्क काफी अच्छा है। इसलिए, ट्रेन से यात्रा करते समय आपको किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। और, रेल मार्ग से यात्रा करना आपके बजट के अनुकूल भी रहेगा। 

एडोट्रिप के सर्किट प्लानर की मदद से अब यात्रा योजना बनाना हुआ और भी आसान। अब आप इस ख़ास शहर के लिए अपने मुताबिक यात्रा की योजना बनाएं । यहां आपको मिलेगा यात्रा से जुड़े हर एक सुझाव। क्लिक करें।  


  • 1 दिन

  • धार्मिक

  • उड़ीसा
  • त्यौहार की तारीख

    12 July 2021

  • स्थान

    जगन्नाथ मंदिर

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